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Shardiya Navratri 2026: शुभ तिथियां, पूजा विधि और दुर्गा अष्टमी का पावन महत्व

हर साल जब वर्षा ऋतु विदा लेती है और हवा में हल्की ठंडक घुलने लगती है, तब घर-घर में एक ही सवाल पूछा जाता है—“इस बार नवरात्रि कब से है?” मंदिरों में सफाई शुरू हो जाती है और बाज़ारों में चुनरी, नारियल, जौ और पूजा-सामग्री सजने लगती है। यह आस्था के साथ-साथ परिवार के एक साथ आने का भी खास समय होता है।

Shardiya Navratri 2026 को लेकर इस बार भी कई सवाल हैं। नवरात्रि कब से शुरू होगी? कलश स्थापना किस समय करें? दुर्गा अष्टमी और महानवमी कब मनाई जाएगी? हवन और व्रत पारण का शुभ समय क्या है? इस लेख में इन सभी सवालों के जवाब सरल भाषा में दिए गए हैं। यहाँ आपको नवरात्रि की तारीखें, शुभ मुहूर्त, घटस्थापना विधि, दुर्गा अष्टमी का महत्व, नौ दिनों के नौ रंग और कन्या पूजन के नियम एक ही जगह मिलेंगे।

Shardiya Navratri 2026 Dates: कब से कब तक रहेगी नवरात्रि?

Sharad Navratri 2026 रविवार 11 अक्टूबर से शुरू होकर 19 अक्टूबर तक चलेगी, और 20 अक्टूबर को नवमी का पारण किया जाएगा। यह पर्व आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होता है और नवमी तक चलता है। हमारे यहाँ पर्व-त्योहार अंग्रेज़ी तारीख़ों से नहीं, चंद्र तिथियों से तय होते हैं, इसीलिए नवरात्रि की तारीख़ हर साल बदलती रहती है। तिथि का समय शहर के सूर्योदय के अनुसार थोड़ा आगे-पीछे भी हो सकता है, इसलिए पूजा से पहले अपने ठाकुर प्रसाद पंचांग से एक बार पुष्टि ज़रूर कर लें। नीचे पूरा कैलेंडर विस्तार से समझाया गया है, ताकि आपको हर दिन की पूजा और मुहूर्त को लेकर कोई असमंजस न रहे।

Shardiya Navratri 2026 Dates:

Shardiya Navratri 2026 रविवार, 11 अक्टूबर से शुरू होगी और सोमवार, 19 अक्टूबर 2026 को नवमी तिथि के साथ नवरात्रि का समापन होगा। इस दौरान भक्त नौ दिनों तक माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना करेंगे। नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना और माँ शैलपुत्री की पूजा से पर्व की शुरुआत होगी। इसके बाद प्रतिदिन देवी के अलग-अलग स्वरूपों का पूजन किया जाता है। दुर्गा अष्टमी 18 अक्टूबर को मनाई जाएगी, जबकि नवमी 19 अक्टूबर को होगी। नवरात्रि व्रत रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए पारण का समय भी महत्वपूर्ण होता है। नीचे Shardiya Navratri 2026 Dates की पूरी जानकारी दिन, तिथि और पूजा के विवरण के साथ दी गई है।

Navratri Dates 2026: घटस्थापना से हवन तक पूरा कैलेंडर

दिनतिथिदिनपूजा / विशेष अवसर
पहला दिन11 अक्टूबर 2026रविवारकलश स्थापना, माँ शैलपुत्री पूजा
दूसरा दिन12 अक्टूबर 2026सोमवारमाँ ब्रह्मचारिणी पूजा
तीसरा दिन13 अक्टूबर 2026मंगलवारमाँ चंद्रघंटा पूजा
चौथा दिन14 अक्टूबर 2026बुधवारमाँ कूष्मांडा पूजा
पाँचवाँ दिन15 अक्टूबर 2026गुरुवारमाँ स्कंदमाता पूजा
छठा दिन16 अक्टूबर 2026शुक्रवारमाँ कात्यायनी पूजा
सातवाँ दिन17 अक्टूबर 2026शनिवारमाँ कालरात्रि पूजा
आठवाँ दिन18 अक्टूबर 2026रविवारदुर्गा अष्टमी, हवन
नौवाँ दिन19 अक्टूबर 2026सोमवारमहानवमी, माँ सिद्धिदात्री पूजा
पारण20 अक्टूबर 2026मंगलवारनवमी व्रत पारण

Navratri 2026 Date October: इस बार अक्टूबर में क्यों?

कई लोग पुराने वर्षों की आदत से सितंबर के अंत की तारीख़ खोजते हैं और भ्रम में पड़ जाते हैं। स्पष्ट रहें कि Sharad Navratri 2026 सितंबर में नहीं, 11 अक्टूबर से शुरू होती है, और अष्टमी हवन 18 अक्टूबर को व नवमी पारण 20 अक्टूबर को होगा। इसलिए किसी दूसरे साल का कैलेंडर या रंग-सूची इस्तेमाल न करें, क्योंकि तिथि, वार और मुहूर्त हर साल बदलते हैं। पूजा की योजना बनाते समय हमेशा उसी साल के पंचांग पर भरोसा करें जिसमें आप व्रत और अनुष्ठान कर रहे हैं, तभी सही फल की प्राप्ति मानी जाती है।

Shardiya Navratri 2026 Shubh Muhurat

Navratri 2026 में कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त विशेष महत्व रखता है, क्योंकि इसी के साथ नौ दिनों की देवी आराधना की शुरुआत होती है। Thakur Prasad Panchang के अनुसार, Shardiya Navratri 2026 में कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त 11 अक्टूबर को दोपहर 11:36 बजे से 12:24 बजे तक रहेगा। इसके साथ ही अष्टमी हवन, महानवमी पूजा और व्रत पारण के समय की जानकारी भी श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण है। नीचे पहले तारीख़ों की तालिका और उसके बाद शुभ मुहूर्त की अलग तालिका दी गई है, ताकि दोनों जानकारी स्पष्ट रूप से समझी जा सके।

Navratri 2026 Shubh Muhurat: समय तालिका

अनुष्ठानशुभ मुहूर्त (समय)
कलश स्थापना एवं दुर्गा पूजादोपहर 11:36 बजे से 12:24 बजे तक
दुर्गा अष्टमी हवनअष्टमी तिथि में, स्थानीय पंचांग के अनुसार
महानवमी पूजानवमी तिथि में, स्थानीय पंचांग के अनुसार
नवमी व्रत पारणसुबह 9:35 बजे के बाद

कलश स्थापना मुहूर्त और पूजा विधि: नवरात्रि की शुरुआत कैसे करें?

नवरात्रि की पूजा का आधार कलश स्थापना है, जिसे घटस्थापना भी कहते हैं। इसमें मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाते हैं और उस पर जल से भरा कलश स्थापित किया जाता है। मान्यता है कि यह कलश माँ दुर्गा के आह्वान का प्रतीक है और पूरे घर में शुभता का वास कराता है। इस वर्ष 11 अक्टूबर, रविवार को कलश स्थापना एवं दुर्गा पूजा का शुभ मुहूर्त दोपहर 11:36 बजे से 12:24 बजे के बीच है। यह लगभग 48 मिनट की छोटी लेकिन अत्यंत शुभ खिड़की है, इसलिए इसे समय पर शुरू करने के लिए सारी पूजा-सामग्री पहले से तैयार रखें।

Durga Navratra Book
Shardiya Navratri 2026: शुभ तिथियां, पूजा विधि और दुर्गा अष्टमी का पावन महत्व

दुर्गा सप्तशती: नवरात्रि पूजन का आवश्यक ग्रंथ:
नवरात्रि के नौ दिनों में दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा, दुर्गा नवरात्र और संबंधित पूजा-ग्रंथों का पाठ अत्यंत शुभ माना जाता है। यह ग्रंथ माँ दुर्गा की महिमा, नौ स्वरूपों की कथा और विधिपूर्वक पूजन-विधि का संपूर्ण वर्णन करता है। घर में नियमित पाठ करने से सकारात्मक ऊर्जा और माँ की कृपा प्राप्त होती है। सही विधि और मंत्रों के साथ पूजा करने के लिए यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी है।

Shardiya Navratri 2026 कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

Shardiya Navratri 2026 की कलश स्थापना 11 अक्टूबर, रविवार को दोपहर 11:36 से 12:24 बजे के बीच करना सबसे शुभ माना गया है। यह समय अभिजीत मुहूर्त के दायरे में आता है, जिसे दिन का सबसे बलवान और निर्विघ्न समय माना जाता है, इसलिए सुबह पूजा न कर पाने वाले श्रद्धालु भी बेझिझक इस समय कलश स्थापना कर सकते हैं। ध्यान रखें कि तिथि और मुहूर्त का समय हर शहर के सूर्योदय व स्थानीय समय के अनुसार कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है, इसलिए अपने शहर का सटीक समय जानने के लिए Thakur Prasad Panchang, Varanasi या अपने स्थानीय पंडित जी से एक बार पुष्टि अवश्य कर लें।

पूजा सामग्री की सूची

घटस्थापना से एक दिन पहले सामग्री जुटा लें ताकि दोपहर के छोटे मुहूर्त में हड़बड़ी न हो। आपको चाहिए: साफ़ मिट्टी और चौड़ा मिट्टी का पात्र, जौ, तांबे या मिट्टी का कलश, गंगाजल, आम के पत्ते, जटा वाला नारियल, लाल चुनरी, रोली, मौली, अक्षत, सुपारी, सिक्का, धूप-दीप, फूल, फल और मिठाई। अखंड ज्योत जलानी हो तो घी या तेल और पर्याप्त बाती भी पहले से रख लें। माँ की मूर्ति या चित्र के लिए लाल कपड़ा बिछाकर आसन तैयार रखें, ताकि मुहूर्त शुरू होते ही तुरंत पूजा आरंभ की जा सके।

कलश स्थापना की सरल विधि

11:36 बजे से पहले स्नान करके साफ़ वस्त्र पहनें और पूजा-स्थान को गंगाजल से पवित्र कर लें। पात्र में मिट्टी की परत बिछाकर जौ बोएँ। कलश में जल और थोड़ा गंगाजल भरें, सुपारी और सिक्का डालें, मुख पर आम के पत्ते रखकर नारियल स्थापित करें और इसे मिट्टी के पात्र के ऊपर रखें। मुहूर्त की 48 मिनट की खिड़की में संकल्प लेकर माँ शैलपुत्री का पूजन करें और दुर्गा सप्तशती या दुर्गा चालीसा का पाठ करें। अखंड ज्योत रखने वाले श्रद्धालु इसे नौ दिन तक जलाए रखें।

नवरात्रि 2026 में देवी का आगमन: हाथी पर सवार माँ दुर्गा

ज्योतिष मान्यता के अनुसार, माँ दुर्गा हर वर्ष अलग-अलग वाहन पर सवार होकर धरती पर आती हैं, और यह वाहन उस दिन तय होता है जिस दिन नवरात्रि का प्रारंभ यानी कलश स्थापना होती है। Shardiya Navratri 2026 की शुरुआत रविवार, 11 अक्टूबर को हो रही है, और शास्त्रों में रविवार व सोमवार को नवरात्रि प्रारंभ होने पर माँ दुर्गा के हाथी पर आगमन का विधान बताया गया है। हाथी पर सवार होकर आने वाली देवी को सुख-समृद्धि, वर्षा और धन-धान्य की प्रचुरता का शुभ संकेत माना जाता है, इसलिए इस वर्ष की नवरात्रि को विशेष रूप से शुभ और फलदायी माना जा रहा है।

यह पूरी तरह पारंपरिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित विषय है, जिसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है, बल्कि यह सदियों पुरानी आस्था और पंचांग-परंपरा का हिस्सा है। फिर भी, देवी के वाहन की यह परंपरा श्रद्धालुओं में उत्साह, सकारात्मकता और भक्ति-भाव को और गहरा करने का काम करती है, और नौ दिनों की पूजा-अर्चना को और भी विशेष बना देती है।

Navratri 2026 Ashtami: हवन और दुर्गा अष्टमी का पावन महत्व

नवरात्रि के नौ दिनों में अष्टमी का दिन सबसे विशेष माना जाता है। इस बार Navratri 2026 Ashtami यानी अष्टमी हवन 18 अक्टूबर, रविवार को होगा। इस दिन माँ महागौरी की आराधना होती है, जिनका स्वरूप शांत, उज्ज्वल और करुणामय है। कहा जाता है कि कठोर तपस्या के बाद माँ का वर्ण अत्यंत गौर हो गया, इसीलिए उन्हें महागौरी कहा गया। हवन के दिन घर-घर में समिधा, घी और नवग्रह सामग्री से आहुति दी जाती है, और कई परिवार इसी दिन कन्या पूजन भी संपन्न कर लेते हैं ताकि अगले दिन नवमी की पूजा शांति से हो सके।

Navratri 2026 Dates
Shardiya Navratri 2026: शुभ तिथियां, पूजा विधि और दुर्गा अष्टमी का पावन महत्व
Shardiya Navratri 2026
Shardiya Navratri 2026: शुभ तिथियां, पूजा विधि और दुर्गा अष्टमी का पावन महत्व

Navratri 2026 Durga Ashtami: महागौरी पूजा और हवन विधि

18 अक्टूबर को महागौरी की पूजा के साथ हवन किया जाता है, जिसे इस पर्व का सबसे शक्तिशाली अनुष्ठान माना जाता है। हवन कुंड में आम की लकड़ी, घी, जौ, तिल और नवग्रह समिधा से आहुतियाँ दी जाती हैं, और साथ में दुर्गा सप्तशती के मंत्रों का उच्चारण होता है। महागौरी को शुद्धता, शांति और क्षमा की देवी माना जाता है। पूजा में सफ़ेद फूल और नारियल का भोग शुभ माना जाता है, और हवन के बाद परिवार के साथ प्रसाद ग्रहण करने की परंपरा है।

Navratri 2026 Durga Ashtami: कन्या पूजन कैसे करें?

बहुत से परिवार 18 अक्टूबर के हवन वाले दिन ही कन्या पूजन संपन्न कर लेते हैं। इसमें छोटी कन्याओं को देवी का रूप मानकर आदर से भोजन कराया जाता है। आमतौर पर दो से दस वर्ष की नौ कन्याओं और एक छोटे बालक को आमंत्रित किया जाता है। पहले उनके पैर धोकर आसन पर बिठाएं, तिलक लगाएं, फिर पूरी, हलवा और चने का प्रसाद परोसें। अंत में सामर्थ्य अनुसार उपहार या दक्षिणा देकर चरण स्पर्श करें। इसमें दिखावे से ज़्यादा प्रेम और सम्मान का भाव मायने रखता है, जो देवी को सर्वाधिक प्रिय है।

नवमी की पूजा: 19 अक्टूबर सोमवार

अष्टमी हवन के अगले दिन, 19 अक्टूबर सोमवार को नवमी तिथि पर माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। यह नवदुर्गा का अंतिम और सबसे सिद्धि-प्रदायक स्वरूप माना जाता है। इस दिन घर में विशेष भोग, हवन की पूर्णाहुति और सामूहिक आरती की जाती है। जो श्रद्धालु नौ दिन का पूर्ण व्रत रख रहे हैं, वे इसी दिन तक उपवास जारी रखते हैं और अगली सुबह विधिपूर्वक पारण करते हैं। नवमी की शाम को कई मंदिरों में विशेष श्रृंगार और भव्य आरती का आयोजन होता है।

नवमी पारण: 20 अक्टूबर सुबह 9:35 बजे के बाद

नवमी पारण 20 अक्टूबर, मंगलवार को सुबह 9:35 बजे के बाद करना शुभ बताया गया है। व्रत खोलने से पहले माँ दुर्गा का पूजन, आरती और प्रसाद अर्पण करें, फिर स्वयं फलाहार या सात्विक भोजन ग्रहण करके पारण करें। पारण का समय इसलिए महत्वपूर्ण होता है क्योंकि इससे पहले व्रत तोड़ना अशुभ माना जाता है। 9:35 बजे के बाद ही अन्न या नमक वाला भोजन ग्रहण करना उचित रहेगा। इस दिन घर के बड़ों का आशीर्वाद लेकर व्रत का समापन करना एक सुंदर पारिवारिक परंपरा है।

Navratri 2026 Colours: 9 दिनों के 9 रंगों की पूरी सूची

आजकल नवरात्रि में हर दिन अलग रंग के कपड़े पहनने की परंपरा बहुत लोकप्रिय हो गई है। पूजा-स्थल की सजावट, रंगोली और गरबा की पोशाकें इन्हीं रंगों के हिसाब से तय की जाती हैं। 2026 के लिए नौ रंग क्रम से नारंगी, सफ़ेद, लाल, गहरा नीला, पीला, हरा, धूसर, बैंगनी और मोरपंखी हरा हैं। यह क्रम हर साल एक जैसा नहीं रहता, क्योंकि पहले दिन का रंग उस वार पर निर्भर करता है जिस दिन नवरात्रि शुरू होती है। इस साल पहला दिन रविवार है और रविवार का रंग नारंगी माना जाता है, इसलिए शुरुआत नारंगी से होती है।

Navratri 2026 9 Colours: तारीख़ के अनुसार सूची

दिनतारीख़देवीरंग
पहला11 अक्टूबरशैलपुत्रीनारंगी
दूसरा12 अक्टूबरब्रह्मचारिणीसफ़ेद
तीसरा13 अक्टूबरचंद्रघंटालाल
चौथा14 अक्टूबरकूष्मांडागहरा नीला
पाँचवाँ15 अक्टूबरस्कंदमातापीला
छठा16 अक्टूबरकात्यायनीहरा
सातवाँ17 अक्टूबरकालरात्रिधूसर (ग्रे)
आठवाँ (हवन)18 अक्टूबरमहागौरीबैंगनी
नौवाँ19 अक्टूबरसिद्धिदात्रीमोरपंखी हरा

रंगों की यह सूची पूरी तरह तारीख़ों के साथ जुड़ी है, इसलिए 18 अक्टूबर के हवन के दिन बैंगनी और 19 अक्टूबर की नवमी पूजा के दिन मोरपंखी हरा पहनना पारंपरिक रूप से शुभ माना जाता है।

क्या रंग पहनना शास्त्रीय नियम है?

सच यह है कि रंगों की यह परंपरा आधुनिक और क्षेत्रीय है, शास्त्रों में इसका सीधा उल्लेख नहीं मिलता। यह एक लोकप्रिय रिवाज़ है जो पिछले कुछ दशकों में समाचार-पत्रों और सोशल मीडिया के ज़रिए फैला। इसलिए अगर आपके पास किसी दिन का रंग उपलब्ध नहीं है तो चिंता करने की ज़रूरत नहीं। लाल और पीला रंग माँ को विशेष रूप से प्रिय माने जाते हैं और किसी भी दिन पहने जा सकते हैं। असली महत्व आपकी श्रद्धा, नियमितता और शुद्ध मन का है, कपड़ों के रंग का नहीं।

नौ देवियाँ और उनका संदेश: हर दिन की आराधना

नवरात्रि की नौ देवियों को नवदुर्गा कहा जाता है। हर स्वरूप जीवन का एक गुण सिखाता है: धैर्य, तप, साहस, ऊर्जा, ममता, शक्ति और सिद्धि। इन्हें बस पूजने के बजाय समझने की कोशिश करें तो नवरात्रि साधना जैसी बन जाती है। नौ दिन का यह क्रम व्यक्ति को धीरे-धीरे अपने भीतर की ओर ले जाता है। पहले तीन दिन नकारात्मकता से लड़ने, अगले तीन दिन सद्गुण जगाने और आख़िरी तीन दिन ज्ञान और सिद्धि की ओर बढ़ने के प्रतीक माने जाते हैं, हालाँकि यह व्याख्या अलग-अलग परंपराओं में थोड़ी बदल जाती है।

नवरात्रि 2026: नौ दिन, नौ देवी — पूरी जानकारी

दिन 1: माँ शैलपुत्री (11 अक्टूबर, रविवार)

नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना के साथ माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है। ये पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं और वृषभ (बैल) पर सवार रहती हैं। इनके एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में कमल का फूल होता है। इस दिन श्रद्धालु सफेद या हल्के रंग के वस्त्र पहनते हैं और माँ को गाय के घी से बना भोग अर्पित करते हैं, जिससे आरोग्य और दीर्घायु की प्राप्ति मानी जाती है। इसी दिन से नौ दिनों का व्रत भी आरंभ होता है।

दिन 2: माँ ब्रह्मचारिणी (12 अक्टूबर, सोमवार)

दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की आराधना होती है, जो तप और संयम की देवी मानी जाती हैं। इनके एक हाथ में जप की माला और दूसरे में कमंडल होता है। मान्यता है कि इन्हें भोग में शक्कर या पंचामृत अर्पित करने से दीर्घायु और मानसिक शांति मिलती है। इस दिन भक्त धैर्य, संयम और आत्म-अनुशासन का संकल्प लेते हैं। सफेद रंग के वस्त्र और सादगी भरी पूजा इस दिन की विशेषता मानी जाती है।

दिन 3: माँ चंद्रघंटा (13 अक्टूबर, मंगलवार)

तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा होती है, जिनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र सुशोभित है। ये सिंह पर सवार रहती हैं और शौर्य व निर्भयता प्रदान करने वाली मानी जाती हैं। इस दिन माँ को दूध से बनी मिठाई या खीर का भोग अर्पित किया जाता है, जिससे मानसिक कष्टों से मुक्ति मिलती है। घंटे और शंख की ध्वनि के साथ आरती करने की परंपरा इस दिन विशेष रूप से निभाई जाती है।

दिन 4: माँ कूष्मांडा (14 अक्टूबर, बुधवार)

चौथे दिन माँ कूष्मांडा की उपासना की जाती है, जिन्हें सृष्टि की रचयिता ऊर्जा माना जाता है। कहा जाता है कि जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब इन्होंने अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की। इस दिन माँ को मालपुआ या कुम्हड़े (कद्दू) का भोग अर्पित किया जाता है, जिससे बुद्धि और निर्णय-शक्ति का विकास होता है। हरे रंग के वस्त्र पहनकर पूजा करना इस दिन शुभ माना जाता है।

दिन 5: माँ स्कंदमाता (15 अक्टूबर, गुरुवार)

पाँचवें दिन माँ स्कंदमाता की पूजा की जाती है, जो भगवान कार्तिकेय (स्कंद) की माता हैं और ममता व वात्सल्य का सर्वोच्च रूप मानी जाती हैं। ये गोद में बालक स्कंद को लिए कमल पर विराजमान रहती हैं। इस दिन माँ को केले का भोग अर्पित करने से आरोग्य और संतान-सुख की प्राप्ति मानी जाती है। यह दिन विशेष रूप से संतान की खुशहाली और स्वास्थ्य की कामना के लिए पूजा जाता है।

दिन 6: माँ कात्यायनी (16 अक्टूबर, शुक्रवार)

छठे दिन माँ कात्यायनी की आराधना होती है, जो योद्धा स्वरूपा देवी हैं और महिषासुर का वध करने वाली मानी जाती हैं। ये सिंह पर सवार रहती हैं और भक्तों को शत्रुओं व बाधाओं से रक्षा प्रदान करती हैं। इस दिन माँ को शहद का भोग अर्पित करना शुभ माना जाता है। कई कन्याएँ मनचाहे और उपयुक्त जीवनसाथी की कामना से इस दिन विशेष रूप से माँ कात्यायनी की पूजा करती हैं।

दिन 7: माँ कालरात्रि (17 अक्टूबर, शनिवार)

सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा होती है। इनका स्वरूप उग्र और श्याम वर्ण का है, परंतु ये भक्तों की रक्षा करने वाली और सभी भय-बाधाओं का नाश करने वाली मानी जाती हैं, इसीलिए इन्हें “शुभंकरी” भी कहा जाता है। इस दिन माँ को गुड़ या गुड़ से बनी मिठाई का भोग अर्पित किया जाता है, जिससे कष्टों और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति मिलती है। रात्रि में विशेष रूप से दीप जलाकर पूजा करने की परंपरा है।

दिन 8: माँ महागौरी — अष्टमी हवन (18 अक्टूबर, रविवार)

आठवें दिन, जो इस वर्ष अष्टमी तिथि और हवन का दिन भी है, माँ महागौरी की पूजा होती है। कठोर तपस्या के बाद इनका वर्ण अत्यंत गौर हो गया था, इसीलिए इन्हें महागौरी कहा गया। ये शांति, पवित्रता और क्षमा की देवी मानी जाती हैं। इस दिन माँ को नारियल का भोग अर्पित किया जाता है और घर-घर में हवन के साथ कन्या पूजन भी संपन्न किया जाता है। सफेद फूल और शुद्धता इस दिन की पूजा की पहचान है।

दिन 9: माँ सिद्धिदात्री — महानवमी (19 अक्टूबर, सोमवार)

नौवें और अंतिम दिन माँ सिद्धिदात्री की आराधना की जाती है, जिन्हें समस्त आठों सिद्धियों की दात्री माना जाता है। ये कमल पर विराजमान रहती हैं और भक्तों को पूर्णता व सिद्धि प्रदान करती हैं। इस दिन माँ को तिल का भोग अर्पित करना शुभ माना जाता है और हवन की पूर्णाहुति के साथ नौ दिनों की पूजा संपन्न होती है। अगली सुबह, 20 अक्टूबर को सुबह 9:35 बजे के बाद व्रत का पारण किया जाएगा।

नवरात्रि व्रत के नियम और फलाहार: क्या खाएँ, क्या न खाएँ?

नवरात्रि में बहुत लोग नौ दिन, कुछ लोग केवल पहले और अंतिम दिन तथा कुछ केवल अष्टमी को व्रत रखते हैं। व्रत का उद्देश्य शरीर और मन को संयमित करना है। इसमें सात्विक भोजन, कम मसाले और नियमित जल सेवन ज़रूरी है। जिन्हें डायबिटीज़, गर्भावस्था, बीमारी या बुज़ुर्ग अवस्था जैसी स्थिति हो, वे कठिन उपवास की जगह हल्का फलाहार अपनाएँ या डॉक्टर से सलाह लेकर व्रत रखें। भूखे रहकर शरीर को कष्ट देना कभी व्रत का उद्देश्य नहीं रहा; व्रत का असली अर्थ संयम है, कष्ट नहीं।

व्रत में क्या खा सकते हैं?

प्रचलित व्रत-आहार में कुट्टू और सिंघाड़े का आटा, साबूदाना, समक के चावल, राजगिरा, आलू, मूँगफली, मखाना, दूध-दही, फल और सेंधा नमक आते हैं। इन्हें कम तेल में बनाएँ और तली चीज़ें सीमित रखें। साबूदाने की खिचड़ी, कुट्टू के आटे की पूरी और सिंघाड़े के आटे का हलवा नौ दिनों में सबसे लोकप्रिय व्यंजन हैं। बीच-बीच में नारियल पानी, छाछ और नींबू पानी लेते रहें ताकि शरीर में पानी की कमी न हो, और शुगर या एनर्जी अचानक न गिरे।

व्रत में किन बातों से बचें?

आमतौर पर अनाज, सामान्य नमक, लहसुन-प्याज़, मांसाहार और शराब से दूर रहा जाता है। इन दिनों क्रोध, झूठ और किसी का अपमान भी वर्जित माना गया है, क्योंकि व्रत केवल भोजन का नहीं बल्कि विचारों का भी संयम है। सोने और दिनचर्या में भी अनुशासन रखने की सलाह दी जाती है, ताकि 18 अक्टूबर के हवन और 20 अक्टूबर के पारण जैसे महत्वपूर्ण दिनों के लिए शरीर और मन दोनों ऊर्जावान बने रहें।

नवरात्रि में क्या करें और क्या न करें?

नवरात्रि के नौ दिन केवल व्रत-उपवास तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें घर, पूजा-स्थान और आचरण से जुड़े कुछ पारंपरिक नियमों का पालन भी किया जाता है। इनका उद्देश्य वातावरण को पवित्र बनाए रखना और मन को साधना के अनुकूल रखना है। नीचे दोनों पहलुओं को अलग-अलग बताया गया है, ताकि नवरात्रि के नौ दिन आप श्रद्धा और अनुशासन के साथ पूरे कर सकें।

नवरात्रि में क्या करें?

  • रोज़ सुबह स्नान के बाद माँ दुर्गा की पूजा करें और दीप जलाएँ
  • घटस्थापना के बाद अखंड ज्योत जलाई हो तो उसे नौ दिन तक लगातार जलता रखें
  • प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा या देवी के मंत्रों का पाठ करें
  • घर और पूजा-स्थान की नियमित साफ़-सफाई रखें
  • सात्विक और शुद्ध भोजन ग्रहण करें
  • ज़रूरतमंदों की मदद करें और दान-पुण्य को प्राथमिकता दें
  • अष्टमी या नवमी को विधिपूर्वक कन्या पूजन करें
  • सूर्यास्त के बाद घर में एक बार पुनः दीप जलाएँ
  • सकारात्मक विचार रखें और परिवार के साथ भजन-कीर्तन में समय बिताएँ

नवरात्रि में क्या न करें?

  • मांसाहार और मदिरा का सेवन न करें
  • घर में लहसुन-प्याज़ का प्रयोग टालें
  • बाल, दाढ़ी या नाखून कटवाने से परहेज़ करें (कई परंपराओं में यह वर्जित माना गया है)
  • चमड़े से बनी वस्तुओं का उपयोग न करें
  • घर को अकेला और सूना न छोड़ें, विशेषकर यदि अखंड ज्योत जल रही हो
  • क्रोध, झूठ और वाद-विवाद से बचें
  • किसी का अपमान या नकारात्मक बातचीत से दूर रहें
  • देर रात तक जागना और अनियमित दिनचर्या अपनाने से बचें
  • बिना कारण पूजा या व्रत के नियम बीच में न तोड़ें

काशी और वाराणसी में नवरात्रि: नवदुर्गा दर्शन की परंपरा

काशी में नवरात्रि का अनुभव बाकी शहरों से अलग होता है। यहाँ माना जाता है कि नौ दिनों में क्रम से नौ दुर्गा मंदिरों के दर्शन करने की परंपरा है। गंगा किनारे सुबह-शाम की आरती, मंदिरों में गूंजते घंटे-शंख और गलियों में प्रसाद की खुशबू मिलकर माहौल को अलग ही रूप दे देते हैं। अगर आप वाराणसी में हैं या बाहर से आने की योजना बना रहे हैं, तो पहले से यात्रा-योजना बना लें, क्योंकि नवरात्रि में मंदिरों में बहुत भीड़ होती है और गलियाँ संकरी हैं। सुबह के शुरुआती घंटों में दर्शन अपेक्षाकृत आसान रहते हैं।

नवदुर्गा दर्शन की योजना कैसे बनाएँ?

काशी में हर दिन की देवी के लिए अलग मंदिर प्रसिद्ध हैं, जैसे शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा (दुर्गाकुंड), स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी (अन्नपूर्णा क्षेत्र) और सिद्धिदात्री। मंदिरों के सटीक पते और दर्शन-समय स्थानीय पुरोहित या मंदिर समिति से पुष्टि करके ही तय करें, क्योंकि पर्व के दिनों में समय बदल सकता है। 18 अक्टूबर के हवन वाले दिन और 19 अक्टूबर की नवमी पर भीड़ सबसे ज़्यादा रहती है, इसलिए इन दो दिनों के लिए विशेष तैयारी करें।

श्रद्धालुओं के लिए सुझाव

पूजा-सामग्री सुबह जल्दी खरीदें और भीड़ वाले स्थानों पर मोबाइल व पर्स का ध्यान रखें। बच्चों और बुज़ुर्गों के साथ हों तो सुबह जल्दी दर्शन करें। पानी की बोतल साथ रखें और मंदिर में लगी पंक्ति व सुरक्षा निर्देशों का पालन करें। 11 अक्टूबर के दोपहर मुहूर्त और 20 अक्टूबर के सुबह के पारण समय को कैलेंडर या मोबाइल में पहले से नोट कर लें, ताकि कोई शुभ समय चूक न जाए। पूजा की सलाह केवल विश्वसनीय पंडित से ही लें।

विजयादशमी 2026: नवरात्रि का समापन

नवमी और पारण के बाद विजयादशमी, यानी दशहरा, मनाई जाती है, जिसे भगवान राम की रावण पर विजय से जोड़ा जाता है। बहुत जगह इस दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाए जाते हैं। यह दिन अच्छाई की बुराई पर जीत की याद दिलाता है। चूँकि इस साल नवमी पारण 20 अक्टूबर की सुबह 9:35 बजे के बाद हो रहा है, इसलिए विजयादशमी के उत्सव भी उसी दिन शाम को मनाए जाएँगे। नए काम की शुरुआत, शस्त्र या वाहन की पूजा और बच्चों की अक्षर-शिक्षा जैसी परंपराएँ भी इसी दिन से जुड़ी हैं।

दशहरा पर क्या करें?

सुबह पारण के बाद देवी को प्रणाम कर पूजन संपन्न करें और जौ का विसर्जन या उसका प्रसाद रूप में उपयोग करें। दिन में शस्त्र-पूजन और वाहन-पूजन की परंपरा निभाई जाती है। शाम को रामलीला या रावण दहन देखने जा सकते हैं। बड़ों का आशीर्वाद लेना, गले मिलना और मिठाई बाँटना इस दिन की सबसे सुंदर परंपराओं में से एक है, जो नवरात्रि के नौ दिनों की साधना को खुशी के साथ पूर्ण करती है।

नवरात्रि से क्या सीखें?

नवरात्रि हमें सिखाती है कि शक्ति का अर्थ केवल बल नहीं, बल्कि संयम, करुणा और साहस का संतुलन है। 11 अक्टूबर के कलश स्थापना से लेकर 20 अक्टूबर के पारण तक की यह नौ दिन की यात्रा अगर हम ध्यान और अनुशासन के साथ पूरी करें, तो यह पर्व सिर्फ रस्म न रहकर एक सच्ची आत्मिक साधना बन जाता है।

निष्कर्ष

Shardiya Navratri 2026 आस्था, अनुशासन और उत्सव का सुंदर संगम है। 11 अक्टूबर को दोपहर 11:36 से 12:24 बजे के शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना से यह यात्रा शुरू होगी, 18 अक्टूबर को अष्टमी हवन, 19 अक्टूबर को नवमी पूजा और 20 अक्टूबर की सुबह 9:35 बजे के बाद पारण के साथ पूर्ण होगी। तिथियाँ और मुहूर्त का ध्यान रखें, पर याद रखें कि माँ को सबसे प्रिय आपकी सच्ची श्रद्धा है। आप सभी को नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएँ। जय माता दी!

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Shardiya Navratri 2026 kab hai?

Shardiya Navratri 2026 रविवार, 11 अक्टूबर से शुरू होकर सोमवार, 19 अक्टूबर तक चलेगी। इसी दिन से नौ दिनों तक माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाएगी।

Navratri 2026 kis din se start hogi?

Navratri 2026 रविवार, 11 अक्टूबर से शुरू होगी। इसी दिन कलश स्थापना के साथ माँ शैलपुत्री की पूजा की जाएगी और नौ दिवसीय अनुष्ठान आरंभ होंगे।

Kalash sthapana ka shubh muhurat kya hai?

Kalash sthapana का शुभ मुहूर्त 11 अक्टूबर, रविवार को दोपहर 11:36 बजे से 12:24 बजे तक रहेगा। यह अभिजीत मुहूर्त के अंतर्गत आता है और अत्यंत शुभ माना गया है।

Navratri 2026 Ashtami kab hai?

इस वर्ष अष्टमी हवन 18 अक्टूबर, रविवार को संपन्न होगा। इसी दिन माँ महागौरी की पूजा और कन्या पूजन भी किया जाता है, जो नवरात्रि के सबसे शुभ दिनों में से एक है।

Navratri 2026 Durga Ashtami ka mahatva kya hai?

दुर्गा अष्टमी माँ महागौरी को समर्पित है, जो शांति और पवित्रता की देवी मानी जाती हैं। इस दिन हवन और कन्या पूजन से घर में सुख-समृद्धि और मन की शुद्धता आती है।

Dussehra 2026 kab hai?

Dussehra यानी विजयादशमी 20 अक्टूबर 2026, मंगलवार को मनाई जाएगी। यह दिन भगवान राम की रावण पर विजय और अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीक है।

Sharad Navratri aur Chaitra Navratri mein kya antar hai?

Sharad Navratri अक्टूबर में आश्विन मास में मनाई जाती है और नौ दिन दुर्गा पूजा का मुख्य पर्व है, जबकि Chaitra Navratri मार्च-अप्रैल में आती है और रामनवमी से जुड़ी होती है।

Navratri colours pehnna zaroori hai kya?

नहीं, नवरात्रि के रंग पहनना एक लोकप्रिय आधुनिक परंपरा है, शास्त्रीय नियम नहीं। श्रद्धा और नियमित पूजा-व्रत रंगों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण माने जाते हैं।

Navratri mein Maa Durga kis vahan par aa rahi hain 2026?

2026 में नवरात्रि रविवार से शुरू हो रही है, इसलिए मान्यता अनुसार माँ दुर्गा हाथी पर सवार होकर आ रही हैं, जो सुख, समृद्धि और शुभता का प्रतीक माना जाता है।

Kanya pujan kab karna chahiye?

कन्या पूजन आमतौर पर अष्टमी या नवमी के दिन किया जाता है। इस वर्ष अधिकांश श्रद्धालु 18 अक्टूबर के हवन वाले दिन या 19 अक्टूबर की नवमी को कन्या पूजन करेंगे।

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